

भगवान किसे माना जाए? – एक प्राकृतिक सोच
कई लोग भगवान को मंदिर, मूर्ति या किसी विशेष रूप में मानते हैं।
लेकिन एक दूसरा दृष्टिकोण यह भी है कि भगवान वही है जिससे हमारा अस्तित्व है।
अगर हम ईमानदारी से देखें, तो इंसान पाँच तत्वों के बिना एक पल भी जीवित नहीं रह सकता:
वायु (हवा) – बिना साँस के जीवन असंभव है
जल (पानी) – शरीर का बड़ा हिस्सा पानी है
अग्नि (ऊर्जा/ताप) – शरीर की गर्मी, पाचन, सूर्य की ऊर्जा
पृथ्वी – अन्न, आश्रय, शरीर स्वयं
आकाश – जिसमें सब कुछ अस्तित्व में है
इन पाँचों के बिना न जीवन है, न शरीर, न सोच।
इस नज़र से देखें तो
👉 भगवान कोई बाहर बैठा हुआ शक्ति नहीं, बल्कि वही तत्व हैं जो हर पल हमें जीवित रखे हुए हैं।
मंदिर बनाम जीवन
अगर कोई मंदिर जाकर शांति पाता है, तो वो उसकी व्यक्तिगत आस्था है।
लेकिन यह मानना भी उतना ही सही है कि—
अगर हवा शुद्ध न हो, तो पूजा व्यर्थ है
अगर पानी न मिले, तो मंत्र बेकार हैं
अगर अन्न न हो, तो भक्ति भी नहीं हो सकती
पहले जीवन है, फिर आस्था।
भगवान को मानने का मतलब यह भी हो सकता है कि:
प्रकृति का सम्मान करें
हवा, पानी, धरती को नष्ट न करें
जीवन को समझें और ज़िम्मेदारी से जिएँ
“मैं भगवान को नकार नहीं रहा,
मैं बस यह कह रहा हूँ कि मेरे लिए भगवान
वही पाँच तत्व हैं जिनकी वजह से मैं जीवित हूँ।
अगर मैं इन्हें बचाऊँ, इन्हें समझूँ,
तो वही मेरी पूजा है।”
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